By: Roshan Choudhary | December 01, 2015

 
 

बात 15 अगस्त 2005 का हैं, महराजा लक्ष्मेश्वर सिंह महाविद्यालय में तत्कालीन प्रिंसिपल भाषावाद और क्षेत्रवाद पर एक बड़ी भाषण दिए थे , चुकि मैं उस कॉलेज में वर्ष 2004-2006 में इंटरमीडिएट वाणिज्य का छात्र था ! और साथ में NCC कैडेट भी था.

उस दिन तो हम अपने प्रधानाचार्य से नहीं पूछ पाए जो, वास्तव में भाषावाद और क्षेत्रवाद क्या हैं ?

लेकिन अब थोड़ा थोड़ा समझने लगा हूँ !

उदहारण मिथिला का हैं !

मिथिला क्षेत्र की भाषा मैथिली हैं लेकिन बिहार सरकार जबरदस्ती कानून बना कर हिन्दी थोपा हुआ हैं ! जिस मैथिली भाषा को भारत सरकार मान्यता दिया उसी भाषा को बिहार सरकार के पास कोई वैल्यू नहीं हैं.

सभी भाषा का अनेको बोली होती हैं, मैथिली भाषा भी बहुत समृद्ध हैं और इसकी भी अनेको बोली हैं, लकिन सरकारी स्तर पर मैथिली भाषा को बार बार अपमानित किया जाता हैं.

न्यायलय के आदेश के बाबजूद बिहार सरकार प्राथमिक शिक्षा में मैथिली को स्थान नहीं दे रहा हैं , बिहार सरकार उलटे उच्य विद्यालय से मैथिली भाषा को पाठ्क्रम से निकाल दिया ! इससे बड़ा भाषावाद क्या हो सकता हैं ?

क्षेत्रवाद का घिनौना रूप भी बिहार में देखने को मिल जाएगा ! पर्यटन विभाग द्वारा मिथिला में होर्डिंग लगाया जाता हैं की बिहार के गया जिला में हिन्दू को अवश्य जाना चाहिए, लेकिन वही भगवती सीता की जन्मस्थली पुनौरा धाम (सीतामढ़ी) पूर्णतः उपेक्षित हैं, बस वा टेम्पो का रूट तक नहि बनाया गया हैं, जहाँ नालंदा विश्विद्यालय के लिए बिहार सरकार करोड़ो रुपया खर्च करती हैं वही मिथिला का उच्य विद्यालय में विज्ञान के लिए प्रयोगशाला तक नहीं हैं क्या ये सभी क्षेत्रवाद की श्रेणी में नहीं आती हैं क्या ?

कब तक मिथिला को अपमान सहना पड़ेगा  ! क्यों ना अब मिथिला राज्य का गठन किया जाए !

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